दोहे
गुरु गोविन्द दोऊ खड़े
यह संत कबीर का एक प्रसिद्ध दोहा है जो आध्यात्मिक गुरु के सर्वोच्च महत्व पर जोर देता है। यह दर्शाता है कि ईश्वर तक पहुँचने का मार्ग दिखाने के कारण गुरु का स्थान सर्वोपरि है।
पृष्ठभूमि
यह दोहा पारंपरिक रूप से 15वीं सदी के रहस्यवादी कवि और संत कबीर दास जी का माना जाता है, जो भक्ति आंदोलन और संत परंपरा की एक अत्यंत लोकप्रिय रचना है। भारतीय उपमहाद्वीप में आध्यात्मिक प्राप्ति के लिए गुरु की अनिवार्यता को उजागर करने के लिए इसका व्यापक रूप से पाठ किया जाता है। अक्सर गुरु पूर्णिमा के अवसर पर और आध्यात्मिक शिक्षाओं में गुरु के प्रति गहरी कृतज्ञता व्यक्त करने के लिए इस दोहे का विशेष रूप से स्मरण किया जाता है।
गुरु गोविन्द दोऊ खड़े, काके लागूं पांय।
बलिहारी गुरु आपने, गोविन्द दियो बताय॥
If my Guru and God stood before me together, whose feet should I touch first? I bow to my Guru, for it was he who revealed God to me.